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सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड (electoral bond) पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना है। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ कर रही थी, जिसकी अगुवाई खुद सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ चुनावी बॉन्ड (electoral bond)  को अवैधानिक बताया है, बल्कि अब तक इसे कितने लोगों ने खरीदा है, किन पार्टियों को चंदा दिया गया है, इसकी भी जानकारी सार्वजनिक करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए SBI  को तीन सप्ताह का समय दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में चार याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी। CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली 05 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ पिछले साल से ही मामले को सुन रही थी। (electoral bond)  इस पीठ में जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा भी रहे। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने 29 अक्टूबर 2023 को हलफनामा पेश किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 31 अक्टूबर 2023 से 2 नवंबर 2023 तक तीन दिनों तक सभी पक्षों को सुना था और अब फैसला दिया है।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनावी बॉन्ड (electoral bond)  योजना पारदर्शिता की कमी, दानदाताओं की गुमनामी और राजनीतिक दलों पर अमीर व्यक्तियों और कंपनियों के प्रभाव के कारण लोकतंत्र के लिए खतरा है। न्यायालय ने यह भी कहा कि योजना कानून के तहत स्थापित मौजूदा नियामक ढाँचे को कमजोर करती है। चुनावी बॉन्ड योजना एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क हैं। यह अभी भी देखा जाना बाकी है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भारतीय लोकतंत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

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Electoral Bonds

चुनावी बॉन्ड कैसे करता है काम?

चुनावी बॉण्ड को साल 2017 में एक वित्त विधेयक के माध्यम से पेश किया गया था। सरकार ने इसे 2 जनवरी 2018 में लागू किया। इससे उन्हीं पार्टियों को फायदा होता है, जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत हों। यही नहीं, उस राजनीतिक पार्टी को लोकसभा या विधानसभा के ताजे चुनाव में कम से कम 1 प्रतिशत वोट भी हासिल करना होता है, तभी वो चुनावी बॉन्ड पा सकते हैं।

चुनावी बॉन्ड भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की चुनिंदा शाखाओं से 1,000 रुपये, 10,000 रुपये, 1 लाख रुपये और 1 करोड़ रुपये के मूल्यवर्ग में खरीदे जा सकते हैं। एसबीआई की 29 शाखाओं को इलेक्टोरल बॉन्ड जारी करने और उसे भुनाने के लिए अधिकृत किया गया था। ये शाखाएँ नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, गाँधीनगर, चंडीगढ़, पटना, राँची, गुवाहाटी, भोपाल, जयपुर और बेंगलुरु में हैं। राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड को 15 दिनों के भीतर एसबीआई में भुनाना होता है, और इस राशि की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होती है। हालाँकि वो अपने दानदाताओं के बारे में कोई जानकारी नहीं रखते।

सरकार ने दावा किया कि यह योजना राजनीतिक दलों के लिए धन जुटाने का एक पारदर्शी तरीका प्रदान करेगी और काले धन के इस्तेमाल को कम करेगी। यह राजनीतिक दलों के लिए धन जुटाने का एक पारदर्शी तरीका प्रदान करता है। यह काले धन के इस्तेमाल को कम करने में मदद करता है। यह राजनीतिक दलों को व्यक्तियों और कंपनियों से अधिक स्वतंत्रता प्रदान करता है।

चुनावी बॉन्ड खरीदकर किसी पार्टी को देने से ‘बॉन्ड खरीदने वाले’ को कोई फायदा नहीं होगा। न ही इस पैसे का कोई रिटर्न मिलता है। ये अमाउंट पॉलिटिकल पार्टियों को दिए जाने वाले दान की तरह है, ऐसे में इससे 80जीजी 80जीजीबी के तहत इनकम टैक्स में छूट मिलती है। हालाँकि चुनावी बॉन्ड को लेकर तमाम आशंकाएँ भी जताई जा रही थी।

चुनावी बॉन्ड के खिलाफ गईं कौन सी बातें?

अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सभी राजनीतिक दलों को इलेक्शन कमीशन के समक्ष इलेक्टोरल बॉन्ड्स की जानकारी देनी होगी। इसके साथ दलों को बैंक डीटेल्स भी देना होगा। अदालत ने कहा है कि राजनीतिक दल,आयोग को एक सील बंद लिफाफे में सारी जानकारी दें, लेकिन ये मामला केवल यहीं नहीं थमा बल्कि इस पूरे चुनावी बॉन्ड स्कीम की वैधता को ही चुनौती दी गई।

दरअसल, चुनावी बॉन्ड (electoral bond)  को लेकर सबसे बड़ी परेशानी इसके माध्यम से पैसे दे रहे लोगों के बारे में जानकारी का सार्वजनिक न होना है। आरटीआई के माध्यम से भी इसकी जानकारी नहीं दी जा रही थी, और बोला जाता था कि ये सूचना आम नागरिकों के लिए है ही नहीं। ऐसे में कौन ये बॉन्ड खरीद रहा है और किस पार्टी को इस माध्यम से दान दे रहा है, ये जानकारी कभी बाहर ही नहीं आ पाती थी।

एक आँकड़े के मुताबिक, चुनावी बॉन्ड के जरिए अब तक 5851 करोड़ रुपए जुटाए जा चुके हैं। सिर्फ मई 2023 में ही 822 करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड जारी किए गए। वहीं, पिछले लोकसभा चुनाव के समय जनवरी से मई 2019 तक 4794 करोड़ रुपए के बॉन्ड जारी किए गए। ये चुनावी बॉन्ड हर साल दो बार जारी किए जाते हैं। आम तौर पर चुनाव के समय। साल 2018 से अब तक इसे 11 बार जारी किया जा चुका है। इसके माध्यम से राजनीतिक पार्टियों को 5851 करोड़ रुपए का चंदा मिला।

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