छत्तीसगढ़ का किसान अब मजबूरी से मजबूती की ओर बढ़ रहा है। वह आर्थिक बदलाव का वाहक बन रहा है। राज्य में खेती आजीविका साधन के साथ सामाजिक और आर्थिक शक्ति का प्रतीक बन गई है। गांवों की गलियों में अब खुशहाली के रंग बिखरने लगे हैं। घरों में पक्की दीवारें खड़ी हो रही हैं। बच्चों की पढ़ाई सुचारू रूप से हो रही है। बेटी की शादी के लिए अब कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ रही है। खेतों में नई और उन्नत मशीनें दौड़ रही हैं। यह बदलाव केवल संख्याओं का खेल नहीं है। यह एक व्यापक नीति और सोच का हिस्सा है जो किसान को आत्मनिर्भर बना रही है।
मुझे बहुत अच्छे से याद है, पहले छोटी-छोटी जरूरतों के लिए किसान काठा दो काठा धान बेचते थे। गांव के किराने की दुकान में, धान के बदले राशन लाते थे, फिर भी जरूरी आवश्यकताएं पूरी नहीं होती थी। तीज-त्योहार, घर की मरम्मत, बेटी की शादी या खेती के लिए संसाधन जुटाना बेहद कठिन था। साहूकारों से ऊंची ब्याज दर पर कर्ज लेने की विवशता थी, और उससे कहीं ज्यादा मजबूरी कर्ज की अदायगी थी। आप सब जानते हैं इन्हें पूरा करने के पहले ही कई किसान दम तोड़ देते थे। कर्ज की रस्सी किसानों को खेत के पेड़ में लटका जाती थी।
बेटी के विवाह की चिंता किसान की चिता बन जाती थी। लेकिन अब समय के साथ इन सबकी परिभाषा बदल रही है। किसान अब अपने उत्पाद को बेहतर कीमत पर बेच पा रहे हैं। खेती को उन्नत बनाने के लिए वे प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के साथ ही जैविक खेती अपनाने लगे हैं। इतना ही नहीं फसल के निर्यात बाजार में प्रवेश करने के लिए नए रास्ते तलाश रहे हैं। सरकार द्वारा दी जा रही आर्थिक सहायता, तकनीकी प्रशिक्षण और समर्थन मूल्य की गारंटी ने उनको व्यवसायिक सोच अपनाने के लिए प्रेरित किया है।
यह सब छत्तीसगढ़ सरकार की किसान हितैषी सोच से संभव हो सका है। सरकार किसानों से 21 क्विंटल धान खरीद रही है। उन्हें 3100 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान की कीमत भुगतान कर रही है। पहले 2300 रुपए प्रति क्विंटल का समर्थन मूल्य मिला और अब 800 रुपए प्रति क्विंटल का बोनस उनके खातों में आ रहा है। यह रकम किसानों के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल रही है। पहले किसान धान बेचने के बाद भी अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साहूकारों की शरण में जाते थे। अत्यधिक ब्याज के कारण वे उधारी के बोझ तले दब जाते थे। लेकिन अब कृषक उन्नति योजना के तहत मिलने वाली अतिरिक्त राशि ने किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है। वे अब पुराना कर्ज चुकाने में सक्षम हैं, बल्कि अपनी नई जरूरतों के लिए भी स्वतंत्र हो गए हैं।
धान उत्पादन के बाद किसानों के पास अब अपनी योजनाएं बनाने की स्वतंत्रता है। कई किसान इस राशि का उपयोग कृषि उपकरण खरीदने में कर रहे हैं। कुछेक किसान बच्चों की शिक्षा पर यह राशि खर्च कर रहे हैं। कई किसान ऐसे भी हैं जिन्होंने बेहतर बीज और उन्नत तकनीकों को अपना कर अपनी खेती को सुदृढ़ बना रहे हैं। कुछ किसानों ने पशुपालन और अन्य कृषि संबंधी व्यवसायों की ओर भी रुख किया है, जिससे उनकी आय के नए स्रोत खुल रहे हैं। अब गांवों की तस्वीर बदलने लगी है। जिन घरों में पहले छप्पर मरम्मत के लिए भी संघर्ष था, वहां अब पक्के मकान बन रहे हैं। किसानों के घरों में ट्यूबवेल, ट्रैक्टर और नई तकनीकी सुविधाएं दिखाई देने लगी हैं। बाजारों में किसानों की बढ़ती क्रय शक्ति स्पष्ट रूप से नजर आ रही है।
धान के समर्थन मूल्य में वृद्धि और बोनस की व्यवस्था ने किसानों के आर्थिक संकट को काफी हद तक हल कर दिया है। वे अब अपने भविष्य के लिए योजनाएं बना रहे हैं। यह परिवर्तन केवल उनकी आर्थिक स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा है। छत्तीसगढ़ का किसान अब परंपरागत मजबूर कृषि से निकलकर आर्थिक सशक्तिकरण की ओर बढ़ रहा है।
सरकार की नीतियां, समर्थन मूल्य की दर में वृद्धि और बोनस की योजनाएं किसानों के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव ला रही हैं। वे अब केवल ‘काठा-काठा’ धान बेचने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ‘गाड़ा-गाड़ा’ धान बेचकर अपने भविष्य को समृद्ध बना रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ अर्थव्यवस्था के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक विकास और ग्रामीण भारत के आत्मनिर्भरता के सपने को साकार करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक-राजनीतिक रणनीतियों के विश्लेषक हैं)