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महासमुंद. महिला अधिकारों की रक्षा के लिए बहादुर कलारिन ने अपने इकलौते बेटे को मौत दे दी। नारी सम्मान के लिए बेटे के मोह का बलिदान करने वाली मां की तपस्या अनुकरणीय है। कलार वीरांगना माता बहादुर कलारिन की शौर्यगाथा को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग छत्तीसगढ़ कलार समाज के जिलाध्यक्ष डॉ. नीरज गजेंद्र ने की है। छत्तीसगढ़ सरकार को लिखे पत्र में डॉ. नीरज गजेंद्र ने बताया है कि माता बहादुर कलारिन की शौर्यगाथा नारी शक्ति के लिए प्रेरणास्पद है।

त्याग और बलिदान की बरसी बसंत पंचमी के दिन का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि माता बहादुर कलारिन के इकलौते बेटे छछान छाडू ने राजपारिवारों से बदला लेने उनकी सौ से भी राजकुमारियों को जीतकर बंधक बना लिया, उन्हें यातनाएं देनी शुरू कर दी। महिलाओं के प्रति इकलौते बेटे के इस व्यवहार ने मां के भीतर की ममता का त्याग करते नारी रक्षा के संकल्प को जगा दिया और एक मां ने खुद के बेटे को मौत की सजा दे दी। छत्तीसगढ़ के कलार परिवार आज भी अपनी वीरांगना माता की त्याग, तपस्या और बलिदान की याद में सरहगढ़ महोत्सव मनाता है।

माता बहादुर कलारिन की शौर्यगाथा के अनेक प्रमाण

डॉ. नीरज ने बताया कि बालौद जिले के सोरर गांव में माता बहादुर कलारिन की शौर्यगाथा के अनेक प्रमाण पुरावशेष के रूप में मौजूद हैं। माता बहादुर कलारिन ने नारी शक्ति को संदेश दिया है कि महिलाओं के मान और सम्मान के लिए यदि अपना जिगर का टुकड़ा भी आड़े आ रहा हो तो उसे रास्ते से हटा देना उचित है। कलार परिवारों में महिलाओं के सम्मान के लिए पहले से भी अनेक प्रस्ताव पारित हुए हैं। सरकारी तौर पर छत्तीसगढ़ सरकार ने माता बहादुर कलारिन की ऐतिहासिक शौर्यगाथा का मान रखने राज्य अलंकरण सम्मान की घोषणा की है। अब समय आ गया है कि माता बहादुर कलारिन की शौर्यगाथा को चीरस्मरणीय बनाया जाए, इसके लिए उनकी जीवनी और बलिदान की कथा को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शामिल गया जाए।

नाट्यकला में बहादुर कलारिन को मिली वैश्विक पहचान

मशहूर पटकथा लेखक और नाट्य निर्देशक हबीब ने माता बहादुर कलारिन की शौर्यगाथा को एडिनवर्ग इंटरनेशनल ड्रामा फेस्टिवल के माध्यम से वैश्विक पटल पर रखा। माता बहादुर कलारिन की त्याग और बलिदान को विश्व स्तर पर पहचान मिली। कलार समाज ने माता की तपस्या कथा को चीरस्मरणीय बनाने के लिए समाजिक बैठकों में वाचन शुरू किया। समाज की ओर से समय-समय पर महिलाओं का सम्मान भी माता बहादुर कलारिन के नाम से किया जाने लगा।

बसंत पंचमी पर त्याग और बलिदान का बरसी महोत्सव

बसंत पंचमी पर जब पूरा देश उत्सव मना रहा था तब कलार परिवार की इस बेटी ने नारी सम्मान की रक्षा के लिए इकलौते बेटे का बलिदान दिया। मान्यता है कि आज भी सोरर गांव में माता बहादुर कलारिन की मौजुदगी का अहसास लोग करते हैं। गंाव और समाज में ऐसी मान्यता है कि महिलाओं के सम्मान में खोट रखने वालों को आज भी माता ही सजा देती है। त्याग और बलिदान की इस बरसी दिवस को कलार परिवार आज भी सरहरगढ़ महोत्सव के रूप में मनाते हैं।

सरहरगढ़ महोत्सव में जुटेंगे प्रदेशभर के कलार परिवार

डॉ. नीरज गजेंद्र ने बताया कि बालोद जिले के सोरर गांव में हर साल बसंत पंचमी के मौके पर सरहरगढ़ महोत्सव मनाया जाता है। इस साल 13-14 फरवरी को दो दिनी महोत्सव में समाज की वीर महिलाओं को माता बहादुर कलारिन के नाम से सम्मानित किया जाएगा। प्रदेशाध्यक्ष युवराज सिन्हा की अगुवाई में होने वाले इस महोत्सव को यादगार बनाने के लिए समाज के हर घर से भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है, जिसमें पूरे छत्तीसगढ़ के हर सामाजिक राज से लोग एकत्र होंगे।

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