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आखिर काली मंदिर में क्यों चढ़ाई जाती है किसी की बलि? ये है इसके पीछे की वजह

इंडिया में कई ऐसे टेंपल हैं, जहां बलि देने का रिवाज है. कई मंदिरों में अब इसे बंद कर दिया गया है, लेकिन कई जगह अभी भी ये प्रथा जारी है. खासकर काली माता के मंदिर में ऐसा किया जाता है. वहीं, इन दिनों नवरात्र में मांस की बिक्री को लेकर बवाल हो रहा है और 9 दिन तक मांस की बिक्री पर बैन (Meat Sale Ban In Navratra) लगाए जाने की बात की जाती है। ऐसे में लोगों का सवाल है कि जब एक तरफ मांस नहीं खाने या जानवर को ना काटने की बात कही जाती है तो फिर कई मंदिरों में बलि क्यों चढ़ाई जाती है.

ऐसे में जानते हैं बलि के पीछे क्या कारण है और हिंदू देवी-देविताओं के किस वजह से बलि चढ़ाई जाती है. जानते हैं बलि से जुड़ी हर बात, जिसके बाद आप समझ पाएंगे कि हिंदू मंदिरों में बलि क्यों चढ़ाई जाती है.

आखिर क्यों चढ़ाई जाती है बलि?

भगवान को चढ़ाई जाने वाली बलि को लेकर ईशा फाउंडेशन की वेबसाइट पर सद्गुरु के माध्यम से बताया गया है कि आखिर बलि क्यों चढ़ाई जाती है. सद्गुरु के अनुसार, देवी-देवताओं के लिए कुछ विशेष ध्वनियां उत्पन्न की गई है और उनके साथ कुछ विधि-विधानों को जोड़ा गया है. उनका कहना है, ‘काली मंदिर में यदि आप बलि देना छोड़ देते हैं, तो इसका मतलब है कि आपने तय कर लिया है कि आपको काली की जरूरत नहीं है क्योंकि कुछ समय बाद उनकी शक्ति घटती जाएगी और फिर वह नष्ट हो जाएंगी, क्योंकि उन्हें इसी तरह बनाया गया है. उन्होंने बताया, आप मूंगफली मुंह के अंदर डालते हैं, एक जीवन की बलि चढ़ती है, तो दूसरा जीवन बेहतर होता है. क्योंकि जीवन के भीतर एक जीवन, उसके अंदर एक जीवन होता है क्योंकि यहां जो है, बस जीवन है.

क्या बलि देने से भगवान खुश होते हैं?

सद्गुरु के अनुसार, यहां तक कि आज भी अधिकांश काली-मंदिरों में रोजाना बलि दी जाती है. दुनिया के हर हिस्से में पशुओं और यहां तक कि मनुष्य तक की बलि देने का रिवाज कभी न कभी जरूर रहा है. दुनिया का कोई भी हिस्सा ऐसा नहीं है, जहां बलि की प्रथा नहीं थी. एक जीवन को मारने का मकसद क्या है? क्या इससे कोई भगवान खुश होगा? इसका भगवान से कोई लेना-देना नहीं है. इसका मकसद है शरीर को नष्ट करके, जीवन-ऊर्जा को बाहर निकालना और इस ऊर्जा का एक खास मकसद के लिए इस्तेमाल करना.

नारियल फोड़ना भी बलि है

सद्गुरु का कहना है, ‘आप नारियल तोड़ते हैं, वह भी एक बलि है. क्योंकि मंदिर में नारियल तोडने या नीबू काटने का उद्देश्य बस नई ऊर्जा को मुक्त करना और उसका लाभ उठाना है. किसी बकरे या मुर्गे या किसी भी चीज को काटने का उद्देश्य भी यही है. काली के मंदिरों और भैरव के मठों पर पशु-बलि देने का आयोजन काफी आम है. लोगों का मानना है कि इससे माता काली पशुओं का मांस खाकर या खून पीकर खुश होंगी.